—महापर्व की शुरूआत पॉच नवम्बर से, कोसी भरने की परम्परा तीसरे दिन
वाराणसी, 03 नवम्बर . काशीपुराधिपति बाबा विश्वनाथ की नगरी में लोक आस्था के महापर्व डाला छठ की तैयारियां शुरू हो गई है. गंगाघाटों के साथ नगर के कुंडों और तालाबों पर साफ—सफाई के साथ वेदी बनाने की तैयारी चल रही है. घरों में भी व्रत को लेकर महिलाओं में उत्साह है. प्रकृति-प्रेम की भावना से ओत—प्रोत लोकपर्व की शुरूआत पॉच नवम्बर को नहाय खाय से शुरू हो रही है.
दूसरे दिन 06 नवम्बर को खरना (संझवत)की रस्म निभाई जाएगी. इसमें पूरे दिन व्रत रहने के बाद महिलाएं संध्या समय में फिर स्नान कर छठी मइया की पूजा विधि विधान से करने के बाद उन्हें मिट्टी के चुल्हें में लकड़ी जलाकर बने रसियाव, खीर, शुद्ध घी लगी रोटी, केला का भोग लगायेंगी. फिर इस भोग को स्वयं खरना करेंगी. खरना के बाद सुहागिनों की मांग भरकर उन्हें सुहागन रहने का आशीर्वाद देंगी. इसके बाद खरना का प्रसाद वितरित किया जायेगा. शाम से ही 36 घंटे का निराजल कठिन व्रत शुरू होगा. तीसरे दिन 07 नवम्बर को सायंकाल गंगा तट या तालाब किनारे व्रती महिलाएं डूबते सूर्य को अर्घ्य देगी. अर्घ्य देने के बाद घर लौटने पर व्रती महिलाएं आंगन में या छत पर कोसी भरती हैं.
पिछले कई सालों से व्रत रखने वाली हुकुलगंज नई बस्ती की सृष्टि पांडेय, राधिका पाठक बताती है कि कोसी भरने की परम्परा में तीसरे दिन अस्ताचलगामी सूर्य और छठी मइया की पूजा कर अर्घ्य देने के बाद घर में सात गन्ने से मंडप बनाया जाता है. इसमें बने कोसी के चारों ओर अर्घ्य की सामाग्री से भरी सूप, डगरा, डलिया, मिट्टी के ढक्कन व तांबे के पात्र को रखकर दीया जलाते हैं. इसके बाद मिट्टी के बने हाथी को रखकर उस पर घड़ा रखा जाता है. कोसी भरते वक्त परिवार की महिलाएं छठ पूजा के गीत गाती हैं. फिर छठ व्रतियों के साथ अन्य महिलाएं भी छठी मइया से परिवार में सुख शान्ति की कामना करती है. उन्होंने बताया कि जिनकी कामना पूरी हो जाती है. वे भी कोसी भराई कर माता के प्रति आस्था जताती है.
एमए साहित्य की छात्रा रही सृष्टि पाठक बताती है कि डाला छठ को लेकर भविष्य पुराण में एक कथा है. सतपुरा में एक दम्पति ने कात्यायन ऋषि की पूजा कर पुत्र प्राप्ति का उपाय पूछा. महाऋषि ने सूर्योपासना कर कोसी भर मन्नतें मांगने की सलाह दी. उपासना के बाद दम्पति को कार्तिक शुक्ल पक्ष षष्ठी को भवार्ण ऋषि के रूप में पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई. तब से व्रत छठी मइया के नाम से विख्यात हुआ. द्वापर युग में इन्द्रप्रस्थ में महारानी द्रोपदी ने छठ व्रत रखते हुए कोसी भरा था. त्रेता युग में रावण पर विजय पाने के लिए अगस्त ऋषि के कहने पर भगवान राम ने सूर्योपासना कर सीतामाता के साथ कोसी भरने की परम्परा निभाई थी. उन्होंने बताया कि चौथे दिन आठ नवम्बर को उगते सूर्य को अर्घ्य देकर व्रत का पारण किया जाएगा.
—बिहार से शुरू लोक आस्था का महापर्व डाला छठ लोकप्रियता के शिखर पर
बनारस के हास्य कवि धकाधक बनारसी बताते हैं कि लोक आस्था के महापर्व की शुरूआत पहले बिहार से शुरू हुई थी. बिहार से आई बहुओं को डाला छठ व्रत करते देख इसका दायरा बढ़ता गया. इसकी पूजा-पद्धति भी अन्य पूजाओं से अलग है. न इसमें पंडित और कर्मकांडी के साथ मंत्रोंच्चार की जरूरत है. और न ही विविध आडम्बर की. छठ को पूरे आस्था और विश्वास के साथ नदी या पोखरे के किनारे प्रकृति की खुली गोद में करने से प्रकृति से भी जुड़ाव महसूस होता है. ख़ास बात है कि डाला छठ पूजा में समाज में व्याप्त ऊंच-नीच और बड़े-छोटे के सब भेदभाव मिट जाते हैं और प्रकृति की छाया में सभी एक समान रूप से भगवान भाष्कर और छठ माता को अर्घ्य देते हैं.
हास्य कवि बताते है कि सामान्यतः लोग अपने जीवन में उगते सूरज की आराधना करते हैं. लेकिन डाला छठ पर्व इस विश्वास को चुनौती देता है. इसमें डूबते और उगते दोनों सूर्यों को अर्घ्य दिया जाता है. इसमें भी पहली अर्घ्य डूबते सूर्य को दी जाती है, जिसका संदेश साफ़ है कि जो आज डूब रहा है, उसकी अवहेलना न कर सम्मान के साथ उसे विदा करिए क्योंकि कल को फिर वही पुनः उदित होगा. कह सकते है छठ का ये अर्घ्य-विधान अतीत के सम्मान और भविष्य के स्वागत का संदेश देता है. भारतीय संस्कृति के मूल में ही प्रकृति के प्रति प्रेम और सम्मान की भावना व्याप्त है.
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/ श्रीधर त्रिपाठी
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